शनिवार

सस्ती कीमत महंगे पत्रकार

जय हो

इस खबर को जानने के बाद पत्रकारों के ऊपर से आपका विश्वास टूट जाएगा...  उनकी खबर पर आप कभी यकीन नहीं करेंगे...   ये पत्रकार खुद अपनी कीमत कैसे लगाते हैं ... यह जानकार आप पत्रकारों को किस नज़र से देखेंगे ? चलिए आपको लाल बुझ्क्कर के चक्कर से मुक्ति देते हुए सीधे खबर पे आते हैं | जेडीयू को छोड़कर पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह लालू यादव की पार्टी में शामिल होने के लिए छपरा में एक बड़ा जलसा का आयोजन किया और इस जलसे को न्यूज़ चैनलों पर दिखाने के लिए कई लोगो को जात के पत्रकारों को जमात बनाने का फरमान जारी हो गया ! पटना के पत्रकारों को इसके कवरेज के लिए मोटी रकम के पैकेट पहुंचाए गए ... साड़ी सुविधा छपरा में देने के लिए वादे हुए हैं ! मोटी रकम( एक लाख )  सिर्फ उन्ही चैनलों के दफ्तर के बॉस तक पहुँचाया गया है जिनके पास ओवी वैन की सुविधा है ! विना ओ वी वैन वाले चैनलों के लिए वहाँ आनेपर पचास हज़ार देने का वादा किया गया है !

अब आप पूछेंगे कि भाई पत्रकारिता को कोठे पर बिठाने वालो की पहचान क्या है ... गौर कीजिये ... खुद पहचान लीजिये .. सिर्फ हिंट दे रहा हूँ ... सफाई कोई नहीं दे सकता ... जो पटना का पत्रकार इसके कवरेज के लिए छपरा गया हो ... ओवी वैन ले गया हो ... खबर नहीं चली हो ... बिना ओवी  वाले का जाना ... अखबार के पटना पटना में रहने वाला  ब्यूरो चीफ सावन में गया तो मांसाहारी ...| वैसे लोकल न्यूज़ वाले रिपोटर की वजाय खुद वहाँ हो तो मामला साफ़ है ! वैसे लालू यादव के पैसे पर जीने वाले पत्रकार तो वैसे भी जाएगा ... भले शर्म को छुपाने के लिए काला चश्मा पहन ले ... लालू के खाने के बाद उसका खाना खाय ... ऐसे की पहचान तो पहले से है पर इस बार पहचान के लिए नितीश कुमार ने भी गेम में हिस्सा लिया है ! अपने सारे कारिंदे को ... चमचा पत्रकार को उस गुट में शामिल कर दिया है ताकि पल पल की खबर सीधे उन तक दिल्ली में पहुंचे !
खेल खिलाड़ी का ... पर खेल रहे है नितीश कुमार , लालू यादव ... और लाखो खर्च किया है प्रभुनाथ सिंह .. पैसा डकारा है जात के जमीनी नेता ने .. जिसके देह से दलाली की बू आती है |

जय हो

2 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसा लगता है राजनीति भी आज कल धंधा हो गई है.....

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  2. आदित्यजी, ये पहली घटना नहीं देश में आये इस तरह की ख़बरें आती रहती हैं। हम सब ये जानते हैं कि पत्रकारिता के बाज़ार में पत्रकार बिक रहे हैं। खरीददार भी बहुत हैं। ऐसे में हमें क्या करना है। इस पर ध्यान देना होगा। पत्रकारिता की इज्ज़त उनके हाथ में नहीं है जो इसे नीलाम कर रहे हैं।

    धन्यवाद,

    पवन कुमार
    यूएनआईटी, दिल्ली

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